चावल के भाव दो साल के शिखर पर, भारत को निर्यात में बड़ा मौका — पर किसानों पर बारिश की मार

सुनहरे पके धान के खेत में चलती कंबाइन हार्वेस्टर और अनाज के बोरे

रसोई का सबसे जरूरी अनाज यानी चावल अंतरराष्ट्रीय बाजार में दो साल से ज्यादा समय के उच्चतम भाव पर पहुंच गया है। अक्टूबर की शुरुआत में चावल के वैश्विक वायदा भाव प्रति हंड्रेडवेट 17 डॉलर के आसपास टिके रहे, जो जुलाई 2024 के बाद का उच्चतम स्तर है। तंग होती आपूर्ति और बढ़ते परिवहन खर्च ने भावों को सहारा दिया है।

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) ने अपने अक्टूबर अनुमान में कहा है कि 2026-27 के सत्र में वैश्विक चावल उत्पादन 552.5 मिलियन टन रह सकता है, जो पिछले सत्र के रिकॉर्ड से 2.4 फीसदी कम है। दुनिया भर में स्टॉक ऐतिहासिक रूप से ऊंचा जरूर है, लेकिन प्रमुख एशियाई बाजारों में खराब मौसम उत्पादन जोखिम बढ़ा रहा है। थाईलैंड में आई बाढ़ से नदी परिवहन बाधित हुआ और अगली फसल की रोपाई भी पिछड़ रही है।

भारत के लिए खबर दोहरी है। अनुमान है कि 2026 में देश का चावल उत्पादन 6.5 फीसदी घटकर 144 मिलियन टन रह जाएगा। इसकी वजह सामान्य से कम मॉनसून बारिश और गर्मी की फसल में कम बुवाई है। यह एक दशक में पहली बार होगा जब भारत का चावल उत्पादन घटेगा — और कुछ उद्योग विशेषज्ञों के मुताबिक यह करीब दो दशकों की सबसे बड़ी गिरावट भी हो सकती है। अंतरराष्ट्रीय अनाज परिषद (IGC) का भी मानना है कि भारत की कम खरीफ फसल ही वैश्विक उत्पादन में एक दशक से ज्यादा समय बाद पहली गिरावट की मुख्य वजह बनेगी।

मानसून के आंकड़े चिंता की वजह साफ करते हैं। एक जून से शुरू हुए चार महीने लंबे मानसून में भारत को सामान्य से 15 फीसदी कम बारिश मिली, जबकि कुछ धान उत्पादक राज्यों में यह कमी 42 फीसदी तक पहुंच गई। धान की परिपक्वता के नाजुक दौर में पड़ी यह सूखी अवधि पैदावार पर सीधा वार करती है। पहले सूखे के बाद बढ़ के कुछ हिस्सों में आई बाढ़ ने नुकसान को और बढ़ा दिया।

भावों की बात करें तो भारतीय चावल के निर्यात मूल्य एक साल से ज्यादा के उच्च स्तर पर बने हुए हैं। अक्टूबर के पहले हफ्ते में 5 प्रतिशत टूटे पारबॉयल्ड चावल के भाव 378 से 384 डॉलर प्रति टन के बीच टिके रहे। कमजोर रुपये ने बढ़ती धान लागत का असर कुछ हद तक संतुलित किया, जिससे निर्यातक प्रतिस्पर्धी बने रहे। वहीं थाईलैंड में बाढ़ की चिंता से 5 प्रतिशत टूटे चावल के भाव 465 से 468 डॉलर प्रति टन तक चढ़ गए।

इसी तंगी में भारत के लिए एक बड़ा अवसर भी दिख रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि प्रतिस्पर्धी देशों में आपूर्ति दबाव के बीच भारत चावल निर्यात बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा सकता है। वियतनाम पहले ही भारत से चावल आयात करने लगा है, जबकि थाईलैंड और पाकिस्तान की आपूर्ति श्रृंखलाएं दबाव में हैं। साल के अंत तक भारत के पास 40 मिलियन टन से ज्यादा अधिशेष रहने का अनुमान है — यह देश के सालाना निर्यात से लगभग दोगुना है।

लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं हैं। समुद्री ईंधन के भाव करीब 400-500 डॉलर से बढ़कर 1,300-1,400 डॉलर तक पहुंच गए हैं, जिससे चावल का परिवहन काफी महंगा हो गया है। विशेषज्ञों के अनुसार पिछले चार महीनों में चावल के वैश्विक थोक भाव करीब 15 फीसदी बढ़ चुके हैं।

आम उपभोक्ता के लिए राहत की बात यह है कि रिकॉर्ड फसलों से बने विशाल सरकारी भंडार भारत को कम उत्पादन के बावजूद निर्यात जारी रखने की गुंजाइश देंगे। इससे घरेलू बाजार में अचानक भारी कमी की आशंका कम है। किसानों के लिए अच्छी खबर यह है कि वैश्विक मांग और ऊंचे भाव उनके धान को बेहतर दाम दिला सकते हैं।

मुख्य बातें:
  • अंतरराष्ट्रीय चावल वायदा भाव प्रति हंड्रेडवेट 17 डॉलर के पास — जुलाई 2024 के बाद का उच्चतम स्तर।
  • FAO का अनुमान: 2026-27 में वैश्विक चावल उत्पादन 552.5 मिलियन टन, पिछले रिकॉर्ड से 2.4 फीसदी कम।
  • भारत में उत्पादन 6.5 फीसदी घटकर 144 मिलियन टन रहने का अनुमान — एक दशक में पहली बार गिरावट।
  • भारतीय 5% टूटा पारबॉयल्ड चावल 378-384 डॉलर प्रति टन — एक साल से ज्यादा का उच्च स्तर।
  • विशेषज्ञों का दावा: वैश्विक आपूर्ति में कसर आने से भारत के निर्यातकों को बड़ा मौका मिल सकता है।
  • लेकिन बढ़ते भाड़े और ईंधन खर्च से चावल का आयात-निर्यात दोनों महंगा हो रहा है।

यह सारांश मीडिया रिपोर्टों पर आधारित है। स्थिति बदल सकती है; ताज़ा जानकारी के लिए आधिकारिक सूत्रों से पुष्टि करें।