सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: बच्चों के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल मौलिक अधिकार

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक ऐतिहासिक फैसले में कहा है कि इंटरनेट का इस्तेमाल करना हर बच्चे का मौलिक अधिकार है, उम्र चाहे कोई भी हो। जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने यह फैसला चाइल्ड सेक्सुअल एक्सप्लॉयटेशन और एब्यूज मैटेरियल (CSEAM) से जुड़े एक मामले में सुनाया है।
अदालत ने साफ कहा — 'हमें कहने में कोई संकोच नहीं कि इंटरनेट का इस्तेमाल और उस तक पहुंच संविधान के अनुच्छेद 21 और 19(1)(a) के तहत हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। हमारे बच्चे, चाहे उम्र कुछ भी हो, समान अधिकार रखते हैं।' बेंच ने कहा कि बच्चों को इंटरनेट से पूरी तरह काट देना उतना ही बेतुका होगा, जितना यह कहना कि बच्चों की कोई चेतना या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं होती।
यह फैसला 'जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन अलायंस' की एक याचिका पर आया, जिसमें अदालत के 23 सितंबर 2024 के पहले के फैसले को प्रभावी ढंग से लागू करने की मांग की गई थी। पहले के फैसले में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों की बच्चों के शोषण वाले कंटेंट की रिपोर्टिंग से जुड़ी जिम्मेदारियां तय की गई थीं।
सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध को असंगत और असरहीन बताया। अदालत का मानना है कि ऐसे बैन बच्चों को अनियमित प्लेटफॉर्मों की ओर धकेल सकते हैं और शोषण के पीड़ितों को शिकायत दर्ज कराने से रोक सकते हैं। इंटरनेट शिक्षा, संवाद और अभिव्यक्ति का जरिया है, खासकर दूर-दराज के इलाकों और दिव्यांग बच्चों के लिए।
अदालत ने आयु-सत्यापन व्यवस्था पर भी गंभीर चिंता जताई। बेंच के अनुसार, कड़े आयु-सत्यापन से बच्चों की संवेदनशील व्यक्तिगत जानकारी का लगातार संग्रह होगा, जिससे निगरानी और दुरुपयोग का बड़ा खतरा पैदा होगा। ऐसे बैन के बजाय माता-पिता की सहमति और बच्चों के खातों के लिए निजता-डिफॉल्ट 'चाइल्ड मोड' जैसे उपाय अपनाने की सलाह दी गई।
फैसले में केंद्र सरकार को निर्देश दिया गया है कि प्लेटफॉर्मों पर CSEAM की पहचान और हटाने के लिए पर्सेप्चुअल-हैश और URL डेटाबेस के राष्ट्रीय दिशानिर्देश बनाए जाएं, ताकि हानिकारक कंटेंट को तेजी से हटाया जा सके। साथ ही गलत तरीके से कंटेंट हटाए जाने से बचाव के लिए सुरक्षा उपाय भी सुनिश्चित करने को कहा गया है।
यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के 2020 के 'अनुराधा भसीन' फैसले को आगे बढ़ाता है। उस फैसले में इंटरनेट के जरिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यापार के अधिकार को संवैधानिक संरक्षण मिला था, लेकिन इंटरनेट की पहुंच को स्वतंत्र मौलिक अधिकार माना जाए या नहीं — यह सवाल खुला था। अब की बेंच ने इसे स्पष्ट रूप से अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार मान लिया है।
इस फैसले का असर राज्य सरकारों की योजनाओं पर भी पड़ेगा। आंध्र प्रदेश सरकार के प्रस्तावित सोशल मीडिया प्रतिबंधों पर अब संवैधानिक सवाल उठ रहे हैं। अदालत ने दोहराया — 'हमारे बच्चों की सुरक्षा और उनकी आजादी में कोई विरोधाभास नहीं है। हमारे बच्चे दोनों के हकदार हैं।'
- बच्चों के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल मौलिक अधिकार — सुप्रीम कोर्ट
- संविधान के अनुच्छेद 21 और 19(1)(a) के तहत मान्यता
- उम्र के आधार पर पूर्ण बैन को अदालत ने असंगत बताया
- हानिकारक कंटेंट पर नकेल, बच्चों की पहुंच पर नहीं — अदालत
- आयु-सत्यापन से निजता और निगरानी का खतरा — चेतावनी
- केंद्र को चाइल्ड पोर्न/अभद्र कंटेंट हटाने के लिए राष्ट्रीय दिशानिर्देश बनाने का निर्देश
यह सारांश मीडिया रिपोर्टों पर आधारित है। स्थिति बदल सकती है; ताज़ा जानकारी के लिए आधिकारिक सूत्रों से पुष्टि करें।

