राहुल गांधी को सुप्रीम कोर्ट से राहत — मानहानि मामले में निचली अदालत की कार्यवाही पर रोक

कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी अंतरिम राहत मिली है। अदालत ने उनके खिलाफ चल रहे एक आपराधिक मानहानि मामले में निचली अदालत की आगे की कार्यवाही पर रोक लगा दी है। यह आदेश 13 अक्टूबर, 2026 को न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति अपारेश कुमार सिंह की पीठ ने दिया।
पूरे मामले की जड़ 2018-19 के राफेल लड़ाकू विमान सौदे से जुड़े राजनीतिक विवाद में है। आरोप है कि उस दौर में राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए अपने भाषणों में 'कमांडर-इन-थीफ' और 'चोरों के सरदार' जैसे शब्द इस्तेमाल किए थे। इसी तरह की टिप्पणियों से जुड़े 'चौकीदार चोर है' के नारे पर भी अलग-अलग जगहों पर कानूनी कार्रवाई हुई थी।
यह शिकायत भाजपा कार्यकर्ता महेश श्रीश्रीमाल ने मुंबई के गिरगांव मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट अदालत में दर्ज कराई थी। शिकायतकर्ता का दावा था कि राहुल गांधी की टिप्पणियों से प्रधानमंत्री और भाजपा की छवि को नुकसान पहुंचा। मजिस्ट्रेट ने अगस्त 2019 में गांधी को समन जारी किए थे, जिसके बाद से मामला कानूनी लड़ाई में उलझा हुआ था।
राहुल गांधी ने इस समन को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी थी, लेकिन अदालत ने 8 सितंबर, 2026 को केस रद्द करने से इनकार कर दिया। हालांकि हाई कोर्ट ने मजिस्ट्रेट की सुनवाई छह हफ्तों के लिए टाल दी थी, ताकि गांधी सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकें। भारत के मुख्य न्यायाधीश के 11 अक्टूबर के पत्र के बाद — जिसमें ऐसे ही मुद्दों वाले मामले 13 अक्टूबर को सूचीबद्ध होने की बात कही गई थी — यह याचिका 12 अक्टूबर को दाखिल की गई।
सुप्रीम कोर्ट में गांधी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी पेश हुए। पीठ ने महाराष्ट्र सरकार और शिकायतकर्ता को नोटिस जारी करके चार हफ्तों के भीतर जवाब दाखिल करने को कहा है। आदेश में कहा गया — 'नोटिस जारी किया जाता है, चार हफ्तों में जवाब दिया जाए। इस बीच ट्रायल कोर्ट के सामने आगे की कार्यवाही स्थगित रहेगी।'
कानून के जानकारों के मुताबिक, इस अंतरिम रोक का मतलब केस का खात्मा या बरी होना नहीं है। यह सिर्फ प्रक्रिया को थामने वाला अस्थायी आदेश है, जबकि सुप्रीम कोर्ट इस बात पर विचार करेगा कि निचली अदालत की कार्यवाही आगे जारी रह सकती है या नहीं। गांधी का मुख्य तर्क रहा है कि उन्होंने अपनी टिप्पणियों में न तो भाजपा का नाम लिया था और न ही किसी पहचान योग्य समूह को निशाना बनाया था, इसलिए शिकायत कानूनी रूप से टिकने योग्य नहीं है।
इस मामले पर राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया अपेक्षित रूप से अलग-अलग है। कांग्रेस इसे नेता पर लगे मामले में न्यायिक प्रक्रिया का स्वाभाविक हिस्सा मान रही है, जबकि भाजपा खेमे की ओर से शिकायतकर्ता के रुख को कानूनी लड़ाई जारी रखने के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। चार हफ्तों के भीतर दाखिल जवाबों के बाद सुप्रीम कोर्ट अगली दिशा तय करेगा।
यह पूरा प्रकरण अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानहानि के बीच की उस पुरानी कानूनी बहस को भी फिर चर्चा में ला रहा है, जो भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक भाषणों की सीमा को लेकर अक्सर उठती है। सुप्रीम कोर्ट का अंतिम रुख न केवल इस केस, बल्कि भविष्य में राजनीतिक बयानों पर दर्ज होने वाले मानहानि मामलों के लिए भी दिशा तय कर सकता है।
- 13 अक्टूबर 2026 को न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और अपारेश कुमार सिंह की पीठ ने ट्रायल कोर्ट की आगे की कार्यवाही पर अंतरिम रोक लगाई
- मामला 2018-19 के राफेल विवाद की टिप्पणियों से जुड़ा — 'कमांडर-इन-थीफ' और 'चोरों के सरदार' जैसे कथित शब्दों पर शिकायत
- शिकायत भाजपा कार्यकर्ता महेश श्रीश्रीमाल ने 2019 में गिरगांव मजिस्ट्रेट कोर्ट में दर्ज कराई; अगस्त 2019 में समन जारी हुआ था
- बॉम्बे हाई कोर्ट ने 8 सितंबर 2026 को केस रद्द करने से इनकार किया, पर छह हफ्तों की मोहलत दी — याचिका 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट पहुंची
- महाराष्ट्र सरकार और शिकायतकर्ता को चार हफ्तों में जवाब दाखिल करने का नोटिस; वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने पैरवी की
- यह अंतरिम आदेश है, अंतिम फैसला नहीं — राजनीतिक भाषण बनाम मानहानि की बहस पर सुप्रीम कोर्ट का रुख आगे दिशा तय करेगा
यह सारांश मीडिया रिपोर्टों पर आधारित है। स्थिति बदल सकती है; ताज़ा जानकारी के लिए आधिकारिक सूत्रों से पुष्टि करें।

